US-Iran Nuclear Talks 2026: Deal Stalls as Iran Rejects 20-Year Freeze Demand
इस्लामाबाद में हुई हाई-प्रोफाइल बातचीत के बाद अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते पर एक बार फिर ब्रेक लग गया है। इस खबर ने साफ कर दिया कि दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम को लेकर मतभेद अभी भी गहरे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, इस बार टकराव की सबसे बड़ी वजह यूरेनियम संवर्धन (uranium enrichment) को लेकर दोनों पक्षों की अलग-अलग शर्तें रहीं। अमेरिका चाहता था कि ईरान कम से कम 20 साल तक अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोक दे, जबकि तेहरान इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ।
बताया जा रहा है कि ईरान ने साफ तौर पर कहा कि वह अधिकतम 5 साल तक ही इस प्रक्रिया को रोकने पर विचार कर सकता है। यही अंतर इस्लामाबाद वार्ता में सबसे बड़ा गतिरोध बन गया, जिसके चलते 21 घंटे चली बातचीत बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई।
रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी पक्ष ने सिर्फ यूरेनियम संवर्धन पर रोक ही नहीं, बल्कि कई अन्य सख्त पाबंदियों की भी मांग रखी थी। इसमें ईरान के पास मौजूद हाई-ग्रेड यूरेनियम स्टॉक को देश से बाहर भेजने की बात भी शामिल थी।
हालांकि, ईरान ने इस प्रस्ताव को “बहुत ज्यादा” बताते हुए खारिज कर दिया। तेहरान ने इसके बदले एक अलग सुझाव दिया, जिसमें उसने अपने यूरेनियम स्टॉक को पूरी तरह खत्म करने की बजाय “डाउन-ब्लेंडिंग” यानी उसकी सांद्रता कम करने की निगरानी वाली प्रक्रिया अपनाने की बात कही।
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बातचीत के दौरान दोनों देशों के बीच सिर्फ तकनीकी मुद्दे ही नहीं, बल्कि भरोसे की कमी भी साफ नजर आई। अमेरिका और उसके सहयोगी देश लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहे हैं। उनका मानना है कि यह कार्यक्रम भविष्य में परमाणु हथियारों की दिशा में जा सकता है।
वहीं, ईरान बार-बार यह दावा करता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उसका परमाणु बम बनाने का कोई इरादा नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि बातचीत के फेल होने के बावजूद अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि डील पूरी तरह टूटी नहीं है। उनके मुताबिक, दोनों पक्षों के बीच संवाद अभी भी जारी है और किसी संभावित समझौते की दिशा में काम हो रहा है।
इस पूरे डिप्लोमैटिक प्रोसेस में पाकिस्तान, मिस्र और तुर्की जैसे देशों की अहम भूमिका सामने आई है, जो मध्यस्थ के तौर पर दोनों पक्षों को करीब लाने की कोशिश कर रहे हैं।
सूत्रों का कहना है कि 21 अप्रैल को खत्म हो रहे सीजफायर से पहले किसी समझौते तक पहुंचने की कोशिश जारी है, ताकि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित की जा सके।
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इसी बीच, ग्लोबल पॉलिटिकल एक्सपर्ट इयान ब्रेमर का एक बयान भी चर्चा में है। उन्होंने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक “मिडिल ग्राउंड” पर सहमति बन सकती है, जिसमें यूरेनियम संवर्धन पर करीब 12 साल की रोक का फॉर्मूला शामिल हो सकता है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच बचे हुए मतभेदों को दूर करने के प्रयास लगातार जारी हैं और उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है।
पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमलों ने भी इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है। जून 2025 और फरवरी 2026 में हुए हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव काफी बढ़ गया था।
करीब 39 दिनों तक चले संघर्ष के बाद 8 अप्रैल को सीजफायर लागू हुआ, जिसके बाद उम्मीद थी कि इस्लामाबाद में होने वाली बैठक से कोई बड़ा समाधान निकल सकता है। लेकिन लंबी बातचीत के बावजूद परमाणु कार्यक्रम पर सहमति नहीं बन पाई और यही डील फेल होने की सबसे बड़ी वजह बन गई।
अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में क्या दोनों देश अपने रुख में नरमी लाते हैं या फिर यह टकराव और गहराता है, क्योंकि इस मुद्दे का असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और सुरक्षा पर पड़ सकता है।
